कोरोना में मुश्किल पढ़ाईः लॉकडाउन में 11% परिवारों को खरीदना पड़ा नया फोन, ताकि बच्चे पढ़ाई करेंDainik Bhaskar


कोरोना की वजह से ज्यादातर राज्यों में अब भी स्कूल बंद हैं। जहां खुले हैं, वहां बच्चों को उनके माता-पिता स्कूल नहीं जाने दे रहे। कोरोना से पहले की स्थिति में स्कूल कब पहुंचेंगे, कोई नहीं कह सकता। इस पर भी जो घर से पढ़ रहे हैं, उन्हें साधनों की कमी महसूस हो रही है। चार में से एक बच्चे के पास न तो कॉपी-किताबें हैं और न ही घर में कोई पढ़ाई में मदद करने वाला। और तो और, ड्रॉप आउट्स और बिना एनरोलमेंट वाले बच्चों की संख्या भी पिछले सालों के मुकाबले बढ़ी हुई है।

एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (ASER या असर) 2020 में इस बार कोरोना का देशभर में पढ़ाई पर असर जानने की कोशिश की गई है। रिपोर्ट में कुछ चौंकाने वाले तो कुछ चिंताजनक तस्वीर पेश करने वाले आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट कहती है कि 11% परिवारों ने लॉकडाउन के दौरान नए फोन खरीदे। इनमें भी 80% ने स्मार्टफोन खरीदे, ताकि घर पर बच्चे पढ़ाई कर सकें। जिन परिवारों के पास स्मार्टफोन नहीं हैं, उनमें से भी 13% ने कहा कि उनके बच्चे किसी और का स्मार्टफोन इस्तेमाल करते हैं।

छोटे बच्चों को स्कूल भेजने से डर रहे हैं लोग

कोरोना का सबसे ज्यादा असर छोटे बच्चों पर पड़ा है। माता-पिता उन्हें लेकर कोई रिस्क नहीं ले रहे। यही वजह है कि 2018 के मुकाबले 2020 में 6 से 10 वर्ष तक के ऐसे बच्चों का प्रतिशत बढ़ गया है, जिन्हें स्कूल एनरोल नहीं किया गया है। असर 2020 की टीम ने जब बच्चों के पैरेंट्स से पूछा तो उन्होंने ही उलट सवाल दाग दिया- स्कूल बंद हैं, ऐसे में एनरोलमेंट करें भी तो कैसे? यानी ज्यादातर बच्चे स्कूलों में एडमिशन का इंतजार कर रहे हैं। खासकर 6-10 वर्ष आयु ग्रुप में।

पढ़ाई ऑनलाइन हो रही है, बच्चों के पास स्मार्टफोन की क्या स्थिति है?

असर की रिपोर्ट कहती है कि 2018 के मुकाबले 2020 में ज्यादा परिवारों के पास अब स्मार्टफोन हैं। 2018 में सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले 29.6% बच्चों के परिवारों में कम से कम एक स्मार्टफोन था, जो 2020 में बढ़कर 56.4% हो गया। इसी तरह प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले आधे बच्चों के परिवार में स्मार्टफोन था, जो अब बढ़कर तीन-चौथाई हो गया है। स्मार्टफोन अब पहले से ज्यादा बच्चों के परिवारों में है, जिससे लॉकडाउन में पढ़ना संभव हो सका। इसी तरह करीब 40 प्रतिशत बच्चों के पास स्मार्टफोन नहीं था, जिनमें से 11% ने लॉकडाउन के दौरान बच्चे की पढ़ाई के लिए मोबाइल खरीदा। इसमें भी 80% से ज्यादा ने स्मार्टफोन खरीदा। जिन लोगों के पास स्मार्टफोन नहीं है, उनमें से करीब 13% ने कहा कि बच्चे किसी परिचित से स्मार्टफोन लेकर पढ़ाई कर रहे हैं।

स्कूल बंद हैं, ऐसे में घर पर मदद कौन कर रहा है?

असर रिपोर्ट इस बार टेलीफोनिक सर्वे के आधार पर बनी है। इसमें जो बच्चे शामिल रहे, उनसे पूछा गया कि उन्हें पढ़ाई में मदद कौन कर रहा है? ज्यादातर के जवाब उनकी क्लास के अनुसार आए। छोटी क्लास में मां की मदद ज्यादा रही तो बढ़ती क्लास के साथ पिता और बड़े भाई-बहन की मदद बढ़ गई। ऐसे में एक बड़ा तबका यह भी बताने वाला था कि परिवार में उन्हें पढ़ाई में कोई मदद नहीं करता और ऐसे बच्चों का प्रतिशत बढ़ती क्लास के अनुसार 16.5% से 31.7% तक पहुंच गया। स्कूल बंद होने का सबसे ज्यादा नुकसान ऐसे बच्चों को ही हो रहा है।

क्या सबके पास किताबें पहुंच गई हैं?

इस मामले में सरकारी स्कूलों के बच्चों की स्थिति अच्छी है। अखिल भारतीय स्तर पर सरकारी स्कूलों के 84.1% बच्चों के पास मौजूदा कक्षा की किताबें पहुंच गई हैं। उन्हें इसे लेकर चिंता नहीं करनी पड़ रही। वहीं, प्राइवेट स्कूल के बच्चों की हालत चिंताजनक है। चार में से एक बच्चे (27.8%) के पास किताब ही नहीं है।

आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें


School Reopening News, ASER Survey Update; Smartphones Bought By Parents For Online Classes and Child School Enrollment

कोरोना की वजह से ज्यादातर राज्यों में अब भी स्कूल बंद हैं। जहां खुले हैं, वहां बच्चों को उनके माता-पिता स्कूल नहीं जाने दे रहे। कोरोना से पहले की स्थिति में स्कूल कब पहुंचेंगे, कोई नहीं कह सकता। इस पर भी जो घर से पढ़ रहे हैं, उन्हें साधनों की कमी महसूस हो रही है। चार में से एक बच्चे के पास न तो कॉपी-किताबें हैं और न ही घर में कोई पढ़ाई में मदद करने वाला। और तो और, ड्रॉप आउट्स और बिना एनरोलमेंट वाले बच्चों की संख्या भी पिछले सालों के मुकाबले बढ़ी हुई है। एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (ASER या असर) 2020 में इस बार कोरोना का देशभर में पढ़ाई पर असर जानने की कोशिश की गई है। रिपोर्ट में कुछ चौंकाने वाले तो कुछ चिंताजनक तस्वीर पेश करने वाले आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट कहती है कि 11% परिवारों ने लॉकडाउन के दौरान नए फोन खरीदे। इनमें भी 80% ने स्मार्टफोन खरीदे, ताकि घर पर बच्चे पढ़ाई कर सकें। जिन परिवारों के पास स्मार्टफोन नहीं हैं, उनमें से भी 13% ने कहा कि उनके बच्चे किसी और का स्मार्टफोन इस्तेमाल करते हैं। छोटे बच्चों को स्कूल भेजने से डर रहे हैं लोग कोरोना का सबसे ज्यादा असर छोटे बच्चों पर पड़ा है। माता-पिता उन्हें लेकर कोई रिस्क नहीं ले रहे। यही वजह है कि 2018 के मुकाबले 2020 में 6 से 10 वर्ष तक के ऐसे बच्चों का प्रतिशत बढ़ गया है, जिन्हें स्कूल एनरोल नहीं किया गया है। असर 2020 की टीम ने जब बच्चों के पैरेंट्स से पूछा तो उन्होंने ही उलट सवाल दाग दिया- स्कूल बंद हैं, ऐसे में एनरोलमेंट करें भी तो कैसे? यानी ज्यादातर बच्चे स्कूलों में एडमिशन का इंतजार कर रहे हैं। खासकर 6-10 वर्ष आयु ग्रुप में। पढ़ाई ऑनलाइन हो रही है, बच्चों के पास स्मार्टफोन की क्या स्थिति है? असर की रिपोर्ट कहती है कि 2018 के मुकाबले 2020 में ज्यादा परिवारों के पास अब स्मार्टफोन हैं। 2018 में सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले 29.6% बच्चों के परिवारों में कम से कम एक स्मार्टफोन था, जो 2020 में बढ़कर 56.4% हो गया। इसी तरह प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले आधे बच्चों के परिवार में स्मार्टफोन था, जो अब बढ़कर तीन-चौथाई हो गया है। स्मार्टफोन अब पहले से ज्यादा बच्चों के परिवारों में है, जिससे लॉकडाउन में पढ़ना संभव हो सका। इसी तरह करीब 40 प्रतिशत बच्चों के पास स्मार्टफोन नहीं था, जिनमें से 11% ने लॉकडाउन के दौरान बच्चे की पढ़ाई के लिए मोबाइल खरीदा। इसमें भी 80% से ज्यादा ने स्मार्टफोन खरीदा। जिन लोगों के पास स्मार्टफोन नहीं है, उनमें से करीब 13% ने कहा कि बच्चे किसी परिचित से स्मार्टफोन लेकर पढ़ाई कर रहे हैं। स्कूल बंद हैं, ऐसे में घर पर मदद कौन कर रहा है? असर रिपोर्ट इस बार टेलीफोनिक सर्वे के आधार पर बनी है। इसमें जो बच्चे शामिल रहे, उनसे पूछा गया कि उन्हें पढ़ाई में मदद कौन कर रहा है? ज्यादातर के जवाब उनकी क्लास के अनुसार आए। छोटी क्लास में मां की मदद ज्यादा रही तो बढ़ती क्लास के साथ पिता और बड़े भाई-बहन की मदद बढ़ गई। ऐसे में एक बड़ा तबका यह भी बताने वाला था कि परिवार में उन्हें पढ़ाई में कोई मदद नहीं करता और ऐसे बच्चों का प्रतिशत बढ़ती क्लास के अनुसार 16.5% से 31.7% तक पहुंच गया। स्कूल बंद होने का सबसे ज्यादा नुकसान ऐसे बच्चों को ही हो रहा है। क्या सबके पास किताबें पहुंच गई हैं? इस मामले में सरकारी स्कूलों के बच्चों की स्थिति अच्छी है। अखिल भारतीय स्तर पर सरकारी स्कूलों के 84.1% बच्चों के पास मौजूदा कक्षा की किताबें पहुंच गई हैं। उन्हें इसे लेकर चिंता नहीं करनी पड़ रही। वहीं, प्राइवेट स्कूल के बच्चों की हालत चिंताजनक है। चार में से एक बच्चे (27.8%) के पास किताब ही नहीं है। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें

School Reopening News, ASER Survey Update; Smartphones Bought By Parents For Online Classes and Child School EnrollmentRead More

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *