सीमा को पहला टास्क लाशों की फोटो खींचने का मिला, अंगुलियां सुन्न पड़ गई थींDainik Bhaskar


20 साल की उम्र में पुरुषों के एकाधिकार क्षेत्र क्राइम फोटोग्राफी में मध्यप्रदेश की पहली महिला फोटोग्राफर बनीं। पहली ही पोस्टिंग भोपाल में CID सब इंस्पेक्टर के तौर पर हुई। ज्वॉइनिंग होते ही पहला टॉस्क मिला गैस त्रासदी में लाशों की तस्वीरें खींचने का। तस्वीरें खींचते वक्त हाथ कांपे, पर हिम्मत नहीं हारी। कई दिनों तक लाशों का वो मंजर आंखों के सामने घूमता रहा। वर्तमान में CID में इंस्पेक्टर (फोटोग्राफी) सीमा कुलश्रेष्ठ की कहानी उन्हीं की जुबानी…

अगस्त 1984 में मेरी नियुक्ति पहली महिला पुलिस फोटोग्राफर सब इंस्पेक्टर के रूप में भोपाल में हुई। अभी हम लोगों की इनहाउस ट्रेनिंग चल ही रही थी, क्योंकि सामान्य फोटोग्राफी और क्राइम फोटोग्राफी में काफी अंतर होता है। हम लोगों को कैमरे और फोटोग्राफी के बारे में बताया जा रहा था। लाशों या क्राइम सीन के साथ हमारा कोई एक्सपोजर नहीं था। अगस्त में जॉइन ही किया था और दिसंबर में यह ट्रेजडी हो गई।

हमें उस वक्त गौतम नगर में क्वार्टर मिला था, मैं वहां रहती थी। वहां तक गैस का रिसाव नहीं था, इसलिए मुझे पता नहीं चला। काफी लोग भागकर उस एरिया में आए थे। सुबह- सुबह मुझे सूचना मिली कि जल्दी ऑफिस पहुंचिए। किसी को जानकारी नहीं थी। वैसे हम 10:00 बजे पहुंचते थे। उस दिन सुबह 8 बजे ही पहुंच गए। वहां, जहांगीराबाद में अफरा-तफरी का माहौल था। कुछ समझ नहीं आ रहा था। किसी को कोई जानकारी नहीं थी। फिर किसी ने कहा कि कोई MIC नाम की जहरीली गैस निकली है।

हमें कहा गया कि कंट्रोल रूम जाकर रिपोर्ट करिए अपने कैमरे के साथ। मैं कंट्रोल रूम चली गई। यह आजकल सिटी कोतवाली में है। वहां से हमें एक SDM महोदय के साथ जाने के लिए कह दिया गया। मेरी ड्यूटी यूनियन कार्बाइड के सामने जेपी नगर में लगी, जहां सबसे ज्यादा इस गैस का असर हुआ था।

मेरी उम्र उस वक्त 20 साल थी। हालांकि मुझे इंटरव्यू में बताया गया था कि आपको क्राइम सीन में लाश की फोटोग्राफी करनी पड़ेगी। लेकिन एकाध लाश की बात कुछ और होती है। लेकिन जब मौके आप जाएं तो देखें कि जानवर मरे पड़े हैं, महिलाएं-पुरुष-बच्चे मरे पड़े हैं। अनगिनत लाशें जब देखें तो एक बीस साल की लड़की के दिलों-दिमाग पर क्या असर पड़ेगा। मैं भौचक्की रह गई। समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे फोटोग्राफी करूं, अपने इमोशंस को कैसे कंट्रोल करूं। उस वक्त रील वाले कैमरे चलते थे। मेरे पास दो-तीन रीलें थीं।

मैंने लाशों की फोटोग्राफी करना शुरू किया। बहुत जल्दी रीलें खत्म हो गई। फिर हम टीम के साथ लाशों को निकलवाने में लग गए। उधर डेयरी थी। वहां भैंस के पेट फूल गए थे। गैस के कारण ऐसा लग रहा था कि पता नहीं कब पेट फट जाएगा। पूरी बस्ती सुनसान थी।

दुधमुंहे बच्चे, महिलाएं, औरतें घरों के अंदर भीतर बुत बने पड़े थे। जानवर भी मरे पड़े थे, किसी के मुंह से झाग निकल रहा था तो किसी की आंखों से खून। उस जहरीली गैस ने किसी को नहीं बख्शा। सिर्फ मुर्गियां घूम रही थीं। शायद उन पर गैस का कोई असर नहीं हुआ था। वह दृश्य इतना भयावह था कि मैं आपको शब्दों में बयां नहीं कर सकती। जब तक अंधेरा नहीं हुआ, हम वहां पर डटे रहे। उसके बाद शाम को हम कंट्रोल रूप में आए, रीलें जमा करा दी। रातभर मुझे नींद नहीं आई। वहां का मंजर मेरी आंखों के सामने आ रहा था। मुझे चक्कर उल्टी और मितली आ रही थी। शायद गैस का कुछ असर था।

हमीदिया अस्पताल तो लाशों से पट गया था। पूरा भोपाल जैसे वीरान सा हो गया था। घटना के तीन दिन बाद मैं ऑफिस जा रही थी तो चक्कर खाकर गिरी और मेरा एक्सीडेंट हो गया। सिर फट गया, चेहरे पर चोंट आई। मुझे जेपी अस्पताल में एडमिट कराया गया। वहां का मंजर तो और भयानक था। मेरे आजू-बाजू में लेटे गैस पीड़ित में से हर तीसरे मिनट में एक व्यक्ति की मौत हो रही थी।

पूरा हॉस्पिटल मरीजों से पटा था। रोने-चीखने चिल्लाने की आवाजें लगातार आ रही थीं। चौथे दिन फिर एक अफवाह उड़ी कि एक बार फिर से गैस निकली है। लोग अस्पताल से भी भागने लगे और भगदड़ मच गई। जो लोग गैस का शिकार हो चुके थे, उनके फेफड़ों में गैस का असर था। उनको सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। भागने और सांस फूलने से भी वो दम तोड़ रहे थे। हांफने की वजह से उनका ऑक्सीजन लेवल कम हो रहा था।

मेरा तो गैस त्रासदी और यूनियन कार्बाइड से एक रिश्ता बन गया। उसके बाद इकबाल मैदान में जितनी भी शांति सभा, रैलियां हुईं, उनको कवर किया। बच्चे को लेकर मां की मूर्ति लगने से लेकर मशाल जुलूस, सभी में मेरी ड्यूटी लगी। तीन सालों तक गैस से जुड़ी हर एक्टिविटीज को मैंने कैमरे में कैद किया। मैं रैलियों में, आयोजनों में सिविल ड्रेस में पहचान छुपाकर जाती थी। पुलिस और प्रशासन के प्रति लोगों में भयंकर गुस्सा भरा हुआ था। मुझे सीनियर्स ने पहचान छुपाने के लिए कहा था, तो मैं पत्रकार बताकर इवेंट को कवर करती थी। आज फिर उस त्रासदी की बरसी है तो वह मंजर हूबहू मेरी आंखों के सामने आ रहा है। भगवान करे, ऐसा मंजर कभी देखने को नहीं मिले।

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सीआईडी विभाग में इंस्पेक्टर (फोटोग्राफी) सीमा कुलश्रेष्ठ।

20 साल की उम्र में पुरुषों के एकाधिकार क्षेत्र क्राइम फोटोग्राफी में मध्यप्रदेश की पहली महिला फोटोग्राफर बनीं। पहली ही पोस्टिंग भोपाल में CID सब इंस्पेक्टर के तौर पर हुई। ज्वॉइनिंग होते ही पहला टॉस्क मिला गैस त्रासदी में लाशों की तस्वीरें खींचने का। तस्वीरें खींचते वक्त हाथ कांपे, पर हिम्मत नहीं हारी। कई दिनों तक लाशों का वो मंजर आंखों के सामने घूमता रहा। वर्तमान में CID में इंस्पेक्टर (फोटोग्राफी) सीमा कुलश्रेष्ठ की कहानी उन्हीं की जुबानी… अगस्त 1984 में मेरी नियुक्ति पहली महिला पुलिस फोटोग्राफर सब इंस्पेक्टर के रूप में भोपाल में हुई। अभी हम लोगों की इनहाउस ट्रेनिंग चल ही रही थी, क्योंकि सामान्य फोटोग्राफी और क्राइम फोटोग्राफी में काफी अंतर होता है। हम लोगों को कैमरे और फोटोग्राफी के बारे में बताया जा रहा था। लाशों या क्राइम सीन के साथ हमारा कोई एक्सपोजर नहीं था। अगस्त में जॉइन ही किया था और दिसंबर में यह ट्रेजडी हो गई। हमें उस वक्त गौतम नगर में क्वार्टर मिला था, मैं वहां रहती थी। वहां तक गैस का रिसाव नहीं था, इसलिए मुझे पता नहीं चला। काफी लोग भागकर उस एरिया में आए थे। सुबह- सुबह मुझे सूचना मिली कि जल्दी ऑफिस पहुंचिए। किसी को जानकारी नहीं थी। वैसे हम 10:00 बजे पहुंचते थे। उस दिन सुबह 8 बजे ही पहुंच गए। वहां, जहांगीराबाद में अफरा-तफरी का माहौल था। कुछ समझ नहीं आ रहा था। किसी को कोई जानकारी नहीं थी। फिर किसी ने कहा कि कोई MIC नाम की जहरीली गैस निकली है। हमें कहा गया कि कंट्रोल रूम जाकर रिपोर्ट करिए अपने कैमरे के साथ। मैं कंट्रोल रूम चली गई। यह आजकल सिटी कोतवाली में है। वहां से हमें एक SDM महोदय के साथ जाने के लिए कह दिया गया। मेरी ड्यूटी यूनियन कार्बाइड के सामने जेपी नगर में लगी, जहां सबसे ज्यादा इस गैस का असर हुआ था। मेरी उम्र उस वक्त 20 साल थी। हालांकि मुझे इंटरव्यू में बताया गया था कि आपको क्राइम सीन में लाश की फोटोग्राफी करनी पड़ेगी। लेकिन एकाध लाश की बात कुछ और होती है। लेकिन जब मौके आप जाएं तो देखें कि जानवर मरे पड़े हैं, महिलाएं-पुरुष-बच्चे मरे पड़े हैं। अनगिनत लाशें जब देखें तो एक बीस साल की लड़की के दिलों-दिमाग पर क्या असर पड़ेगा। मैं भौचक्की रह गई। समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे फोटोग्राफी करूं, अपने इमोशंस को कैसे कंट्रोल करूं। उस वक्त रील वाले कैमरे चलते थे। मेरे पास दो-तीन रीलें थीं। मैंने लाशों की फोटोग्राफी करना शुरू किया। बहुत जल्दी रीलें खत्म हो गई। फिर हम टीम के साथ लाशों को निकलवाने में लग गए। उधर डेयरी थी। वहां भैंस के पेट फूल गए थे। गैस के कारण ऐसा लग रहा था कि पता नहीं कब पेट फट जाएगा। पूरी बस्ती सुनसान थी। दुधमुंहे बच्चे, महिलाएं, औरतें घरों के अंदर भीतर बुत बने पड़े थे। जानवर भी मरे पड़े थे, किसी के मुंह से झाग निकल रहा था तो किसी की आंखों से खून। उस जहरीली गैस ने किसी को नहीं बख्शा। सिर्फ मुर्गियां घूम रही थीं। शायद उन पर गैस का कोई असर नहीं हुआ था। वह दृश्य इतना भयावह था कि मैं आपको शब्दों में बयां नहीं कर सकती। जब तक अंधेरा नहीं हुआ, हम वहां पर डटे रहे। उसके बाद शाम को हम कंट्रोल रूप में आए, रीलें जमा करा दी। रातभर मुझे नींद नहीं आई। वहां का मंजर मेरी आंखों के सामने आ रहा था। मुझे चक्कर उल्टी और मितली आ रही थी। शायद गैस का कुछ असर था। हमीदिया अस्पताल तो लाशों से पट गया था। पूरा भोपाल जैसे वीरान सा हो गया था। घटना के तीन दिन बाद मैं ऑफिस जा रही थी तो चक्कर खाकर गिरी और मेरा एक्सीडेंट हो गया। सिर फट गया, चेहरे पर चोंट आई। मुझे जेपी अस्पताल में एडमिट कराया गया। वहां का मंजर तो और भयानक था। मेरे आजू-बाजू में लेटे गैस पीड़ित में से हर तीसरे मिनट में एक व्यक्ति की मौत हो रही थी। पूरा हॉस्पिटल मरीजों से पटा था। रोने-चीखने चिल्लाने की आवाजें लगातार आ रही थीं। चौथे दिन फिर एक अफवाह उड़ी कि एक बार फिर से गैस निकली है। लोग अस्पताल से भी भागने लगे और भगदड़ मच गई। जो लोग गैस का शिकार हो चुके थे, उनके फेफड़ों में गैस का असर था। उनको सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। भागने और सांस फूलने से भी वो दम तोड़ रहे थे। हांफने की वजह से उनका ऑक्सीजन लेवल कम हो रहा था। मेरा तो गैस त्रासदी और यूनियन कार्बाइड से एक रिश्ता बन गया। उसके बाद इकबाल मैदान में जितनी भी शांति सभा, रैलियां हुईं, उनको कवर किया। बच्चे को लेकर मां की मूर्ति लगने से लेकर मशाल जुलूस, सभी में मेरी ड्यूटी लगी। तीन सालों तक गैस से जुड़ी हर एक्टिविटीज को मैंने कैमरे में कैद किया। मैं रैलियों में, आयोजनों में सिविल ड्रेस में पहचान छुपाकर जाती थी। पुलिस और प्रशासन के प्रति लोगों में भयंकर गुस्सा भरा हुआ था। मुझे सीनियर्स ने पहचान छुपाने के लिए कहा था, तो मैं पत्रकार बताकर इवेंट को कवर करती थी। आज फिर उस त्रासदी की बरसी है तो वह मंजर हूबहू मेरी आंखों के सामने आ रहा है। भगवान करे, ऐसा मंजर कभी देखने को नहीं मिले। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें

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