सबसे ठंडे घंटों में एक के बाद एक 9 मौतें, कोटा के अस्पताल में 20% वार्मर और नेबुलाइजर खराबDainik Bhaskar


कोटा का जेके लोन अस्पताल एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। कारण इस अस्पताल में हुईं नवजातों की मौतें हैं, जो 10 दिसंबर तड़के तीन बजे से लेकर सुबह साढ़े 10 बजे के बीच हुईं। इस घटनाक्रम के बाद एक बार फिर सिस्टम की बदइंतजामी उजागर हुई है।

दैनिक भास्कर की पड़ताल में सामने आया है कि यहां ठंड में बच्चों की जान बचाने के लिए जरूरी मेडिकल उपकरणों में 20% खराब पड़े हैं। इनमें नेबुलाइजर, वॉर्मर, इन्फ्यूजन पंप शामिल हैं। पिछले साल सर्दी के 35 दिनों में 100 से ज्यादा मौतों के बाद कोटा पूरे देश में चर्चा में आ गया था।

तब सरकार ने आमूलचूल परिवर्तन करने का आश्वासन दिया था। कुछ उपकरण भिजवाए जरूर थे, लेकिन फिर से ये खराब हो गए। अस्पताल प्रशासन ने आठ घंटे में नौ मौतों को सामान्य नहीं माना। हर महीने 60 से 100 मौतों का आंकड़ा है। इस लिहाज से 2 से 5 मौतें औसतन होती हैं, लेकिन रात से सुबह के बीच नौ मौतों ने नींद उड़ा दी है।

स्टाफ की कमी

पोस्ट कितने पद स्वीकृत कितने अभी हैं
प्रोफेसर 3 1
एसोसिएट प्रोफेसर 4 1
असिस्टेंट प्रोफेसर 7 7
सीनियर रेजिडेंट 7 5

सभी मौतें तब, जब पारा सबसे कम, कई वॉर्मर बंद

अस्पताल सूत्रों ने बताया कि रात का तापमान 12 डिग्री के आसपास पहुंच गया है। यहां 98 नवजात भर्ती हैं और 71 वॉर्मर हैं। ऐसे में लगभग हर बच्चे को वॉर्मर की जरूरत है लेकिन उपलब्धता के बावजूद 11 वॉर्मर खराब पड़े हैं। पिछले साल भी वॉर्मर की कमी उजागर हुई थी। 10 दिसंबर की सभी मौतें तड़के तेज सर्दी के समय ही हुई हैं। इस समय 24 घंटे का सबसे कम तापमान होता है।

आखिर सर्दी शुरू होने से पहले क्यों नहीं करते इंतजाम

यहां नेबुलाइजर भी 56 की संख्या में आए थे, लेकिन 20 खराब हैं। इंफ्यूजन पंप का हाल भी जुदा नहीं है। 89 में से 25 अनुपयोगी हैं। कड़ाके की ठंड आने से पहले ही कोटा अस्पताल में कोताही के आलम ने परिवारों की खुशियों को उजाड़ने का जैसे इंतजाम कर दिया। अब जब इतनी मौतें हो गई, कलेक्टर से लेकर चिकित्सा मंत्री तक रिपोर्ट मांग रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ठंड होने के पहले ही जरूरी इंतजाम क्यों नहीं किए जाते।

सात बच्चे अस्पताल में ही जन्मे थे, दो रेफर हुए थे

मृत नवजातों में 7 बच्चों का जन्म अस्पताल में हुआ। 2 बच्चे बूंदी से रेफर होकर आए थे। सभी बच्चे 1 से 7 दिन के थे।

विधायक ने कहा- एक प्रोफेसर और एक एसोसिएट के भरोसे 230 बच्चे

कोटा दक्षिण विधायक संदीप शर्मा ने इसे राज्य सरकार की लापरवाही बताया। उन्होंने कहा- अस्पताल में डॉक्टर की जरूरत है। पिछली बार की घटना के बाद यहां नए चिकित्सक पदस्थ किए थे, जो तबादला करवाकर चले गए। एक प्रोफेसर और एक एसोसिएट प्रोफेसर के भरोसे अस्पताल चल रहा है। 230 बच्चों की जान का जिम्मा एक प्रोफेसर और एक एसोसिएट प्रोफेसर नहीं उठा सकता। एक ही एसोसिएट है, जबकि जरूरत के हिसाब से तीन से चार होने चाहिए।

मौतों पर अस्पताल की सफाई

3 बच्चे ब्रॉड डेड थे। 3 बच्चों को जन्मजात बीमारी थी। एक का सिर नहीं था, एक के सिर में पानी भरा था। बूंदी से रैफर होकर आए 2 बच्चों को सेप्टिक शॉक (इंफेक्शन) था। एक बच्चे में शुगर की कमी थी। मौत के कारणों की जांच की जा रही है।

डॉ एससी दुलारा, अस्पताल अधीक्षक

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9 deaths one after the coldest hours… 20% of warmers, nebulizers in Kota hospital worsen

कोटा का जेके लोन अस्पताल एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। कारण इस अस्पताल में हुईं नवजातों की मौतें हैं, जो 10 दिसंबर तड़के तीन बजे से लेकर सुबह साढ़े 10 बजे के बीच हुईं। इस घटनाक्रम के बाद एक बार फिर सिस्टम की बदइंतजामी उजागर हुई है। दैनिक भास्कर की पड़ताल में सामने आया है कि यहां ठंड में बच्चों की जान बचाने के लिए जरूरी मेडिकल उपकरणों में 20% खराब पड़े हैं। इनमें नेबुलाइजर, वॉर्मर, इन्फ्यूजन पंप शामिल हैं। पिछले साल सर्दी के 35 दिनों में 100 से ज्यादा मौतों के बाद कोटा पूरे देश में चर्चा में आ गया था। तब सरकार ने आमूलचूल परिवर्तन करने का आश्वासन दिया था। कुछ उपकरण भिजवाए जरूर थे, लेकिन फिर से ये खराब हो गए। अस्पताल प्रशासन ने आठ घंटे में नौ मौतों को सामान्य नहीं माना। हर महीने 60 से 100 मौतों का आंकड़ा है। इस लिहाज से 2 से 5 मौतें औसतन होती हैं, लेकिन रात से सुबह के बीच नौ मौतों ने नींद उड़ा दी है। सरकारी अस्पताल में 8 घंटे में 9 नवजात की मौत, पिछले साल यहीं 35 दिन में 107 बच्चों की जान गई थी स्टाफ की कमी पोस्ट कितने पद स्वीकृत कितने अभी हैं प्रोफेसर 3 1 एसोसिएट प्रोफेसर 4 1 असिस्टेंट प्रोफेसर 7 7 सीनियर रेजिडेंट 7 5 सभी मौतें तब, जब पारा सबसे कम, कई वॉर्मर बंद अस्पताल सूत्रों ने बताया कि रात का तापमान 12 डिग्री के आसपास पहुंच गया है। यहां 98 नवजात भर्ती हैं और 71 वॉर्मर हैं। ऐसे में लगभग हर बच्चे को वॉर्मर की जरूरत है लेकिन उपलब्धता के बावजूद 11 वॉर्मर खराब पड़े हैं। पिछले साल भी वॉर्मर की कमी उजागर हुई थी। 10 दिसंबर की सभी मौतें तड़के तेज सर्दी के समय ही हुई हैं। इस समय 24 घंटे का सबसे कम तापमान होता है। आखिर सर्दी शुरू होने से पहले क्यों नहीं करते इंतजाम यहां नेबुलाइजर भी 56 की संख्या में आए थे, लेकिन 20 खराब हैं। इंफ्यूजन पंप का हाल भी जुदा नहीं है। 89 में से 25 अनुपयोगी हैं। कड़ाके की ठंड आने से पहले ही कोटा अस्पताल में कोताही के आलम ने परिवारों की खुशियों को उजाड़ने का जैसे इंतजाम कर दिया। अब जब इतनी मौतें हो गई, कलेक्टर से लेकर चिकित्सा मंत्री तक रिपोर्ट मांग रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ठंड होने के पहले ही जरूरी इंतजाम क्यों नहीं किए जाते। सात बच्चे अस्पताल में ही जन्मे थे, दो रेफर हुए थे मृत नवजातों में 7 बच्चों का जन्म अस्पताल में हुआ। 2 बच्चे बूंदी से रेफर होकर आए थे। सभी बच्चे 1 से 7 दिन के थे। विधायक ने कहा- एक प्रोफेसर और एक एसोसिएट के भरोसे 230 बच्चे कोटा दक्षिण विधायक संदीप शर्मा ने इसे राज्य सरकार की लापरवाही बताया। उन्होंने कहा- अस्पताल में डॉक्टर की जरूरत है। पिछली बार की घटना के बाद यहां नए चिकित्सक पदस्थ किए थे, जो तबादला करवाकर चले गए। एक प्रोफेसर और एक एसोसिएट प्रोफेसर के भरोसे अस्पताल चल रहा है। 230 बच्चों की जान का जिम्मा एक प्रोफेसर और एक एसोसिएट प्रोफेसर नहीं उठा सकता। एक ही एसोसिएट है, जबकि जरूरत के हिसाब से तीन से चार होने चाहिए। मौतों पर अस्पताल की सफाई 3 बच्चे ब्रॉड डेड थे। 3 बच्चों को जन्मजात बीमारी थी। एक का सिर नहीं था, एक के सिर में पानी भरा था। बूंदी से रैफर होकर आए 2 बच्चों को सेप्टिक शॉक (इंफेक्शन) था। एक बच्चे में शुगर की कमी थी। मौत के कारणों की जांच की जा रही है। -डॉ एससी दुलारा, अस्पताल अधीक्षक आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें

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