50 साल पुरानी आबादी के हिसाब से हैं लोकसभा की सीटें; संविधान में बदलाव नहीं होता तो अकेले यूपी से 238 सांसद होतेDainik Bhaskar


हमारे देश में 25 लाख से ज्यादा की आबादी पर एक लोकसभा सांसद है। ये दुनिया में सबसे ज्यादा है। संविधान अधिकतम दस लाख की आबादी पर एक सांसद की बात कहता है। साथ ही कहता है कि सांसदों की संख्या 550 से ज्यादा नहीं हो सकती। इसी आबादी के हिसाब से राज्यों में सीटों की संख्या बढ़ाने या घटाने की बात भी हमारे संविधान में कही गई है। इसके हिसाब से 1971 तक देश और अलग-अलग राज्यों में सीटों की संख्या भी घटी-बढ़ी। लेकिन, पिछले 50 साल से इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है। इसका नतीजा ये हुआ कि आज यूपी में 30 लाख लोगों पर एक सांसद है तो तमिलनाडु में करीब 20 लाख लोगों पर।

ऊपर जो बातें हमने की उससे दो तरह के सवाल उठते हैं। पहला मौजूदा आबादी के हिसाब से राज्यों में सीटों की संख्या में बदलाव किया जाए तो कहां कितने सांसद होंगे और कितने लोगों पर एक सांसद होगा? दूसरा 10 लाख की आबादी पर एक सांसद हो तो देश में कितने सांसद होंगे और किस राज्य में कितने सांसद होंगे? आइए, दोनों बातों को बारी-बारी से समझते हैं…

देश की मौजूदा आबादी के हिसाब से अगर राज्यों में सीटों को बांटा जाए तो यूपी में सीटों की संख्या बढ़कर 94 हो जाएगी। बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे उत्तरी राज्यों में भी सीटें बढ़ेंगी। वहीं, तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिण के राज्यों में सीटों की संख्या घटेगी। इस स्थिति में 25.25 लाख आबादी पर एक सांसद होगा। हालांकि, इसमें छोटे राज्य शामिल नहीं होगें। संविधान में छोटे राज्यों के लिए कम से कम एक सीट की व्यवस्था दी गई है। टेबल से डिटेल समझें…

अगर देश में 550 सीटों की शर्त को खत्म कर दें और हर 10 लाख की आबादी पर एक सांसद वाले नियम के हिसाब से सीटें बांटी जाएं तो अकेले यूपी में सीटों की संख्या 238 हो जाएगी। इस स्थिति में देश में कुल 1375 सीटें होगीं। यहां, एक बात और बता दें कि जिन राज्यों में 6 लाख से कम की आबादी है वहां 10 लाख पर एक सीट वाला नियम लागू नहीं होगा। ऐसे राज्यों में एक सांसद तो रहेगा ही रहेगा। ये हम नहीं संविधान कहता है।

पर अब भी तीन सवाल हैं: सीटें बढ़ाने पर रोक क्यों लगी? और क्या सीटें बढ़ सकती हैं? सीटें बढ़ने का असर क्या होगा?
1. सीटें बढ़ाने पर रोक क्यों लगी?

संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप बताते हैं, संविधान में मूल प्रावधान यही है कि जनसंख्या के आधार पर सीटें तय होंगी। यानी जहां आबादी ज्यादा, वहां सीटें भी ज्यादा। 1970 के दशक में सरकार ने फैमिली प्लानिंग पर भी जोर दिया। इसका नतीजा ये हुआ कि दक्षिण के राज्यों ने तो इस पर काम किया, लेकिन उत्तर भारत के राज्यों में इस पर ज्यादा काम नहीं हुआ। नतीजतन दक्षिण के राज्यों में आबादी कम और उत्तरी राज्यों में आबादी बढ़ने लगी। अब चिंता ये हुई कि जिन्होंने फैमिली प्लानिंग कर आबादी काबू में की, उनके यहां सीटें कम हो जाएंगी। यानी संसद में उन राज्यों का प्रतिनिधित्व भी कम हो जाएगा। और जिन राज्यों में आबादी बढ़ी, वहां सीटें बढ़ेंगी और संसद में उनका प्रतिनिधित्व भी बढ़ेगा। इस पर विवाद हुआ और 1977 में सरकार ने संविधान में संशोधन कर तय कर दिया कि 2001 तक 1971 की जनगणना के आधार पर ही संसद में सीटें होंगी। लेकिन 2002 में अटल सरकार ने इसे बढ़ाकर 2026 तक कर दिया।

2. क्या सीटें बढ़ सकती हैं?
संविधान के आर्टिकल-81 के मुताबिक लोकसभा में सीटों की संख्या 550 से ज्यादा नहीं हो सकती। ऐसे में क्या सीटें बढ़ सकती हैं? इस बारे में सुभाष कश्यप का कहना है कि संविधान में यही है कि आबादी के हिसाब से सीटों की संख्या तय होगी। क्योंकि अभी 2026 तक सीटें 1971 की जनगणना के आधार पर ही रहेंगी, इसलिए ये प्रावधान है। लेकिन जब 2026 के बाद अगली जनगणना होगी, तो सीटें आबादी के हिसाब से बढ़ सकती हैं। अगर सरकार इसकी तय सीमा 2026 से और आगे बढ़ाती है, तो फिर तब तक 550 सीटें ही रहेंगीं।

3. सीटें बढ़ने का क्या असर होगा?
जो पहले हुआ था, वही होगा। मतलब जिन राज्यों में आबादी कम होगी, वहां सीटों की संख्या भी कम होगी, लेकिन जिन राज्यों में आबादी ज्यादा होगी, वहां सीटें भी ज्यादा होंगी। इसको ऐसे समझ सकते हैं। जैसे अभी तमिलनाडु की आबादी 7.78 करोड़ है और वहां लोकसभा की 39 सीटें हैं। जबकि मध्य प्रदेश की आबादी 8.53 करोड़ से ज्यादा है, लेकिन यहां 29 सीटें ही हैं। तो जब आबादी के हिसाब से सीटों का बंटवारा होगा, तो मध्य प्रदेश, राजस्थान समेत उत्तर भारत के कई राज्यों में सीटें दोगुनी-तिगुनी तक बढ़ जाएगी। जबकि, तमिलनाडु, केरल समेत दक्षिणी राज्यों में सीटें बढ़ेंगी तो, लेकिन ज्यादा नहीं। इसी विवाद की वजह से पहले भी आबादी के हिसाब से सीटें बढ़ाने के प्रावधान पर रोक लगा दी थी।

1971 की जनगणना के आधार पर ही है लोकसभा सीटों की संख्या

  • किसी राज्य में लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या कितनी होगी, इसका काम परिसीमन आयोग करता है। 1952 में परिसीमन आयोग का गठन किया गया था। संविधान के अनुच्छेद 82 में आयोग का काम भी तय किया गया है। इसके मुताबिक 10 साल में जब पहली बार जनगणना होगी, तो उसके बाद परिसीमन किया जाएगा।
  • 1976 में आपातकाल के दौरान संविधान में 42वां संशोधन किया गया। इस संशोधन के तहत 1971 की जनगणना के आधार पर ही 2001 तक विधानसभाओं और लोकसभा की सीटों की संख्या को स्थिर कर दिया गया।
  • 2001 में संविधान में 84वां संशोधन किया गया। इसके तहत 2026 के बाद जब पहली जनगणना होगी और उसके आंकड़े प्रकाशित हो जाएंगे, तो ही लोकसभा का परिसीमन किया जाएगा। यानी 2026 के बाद जनगणना होगी 2031 में। उसके बाद ही लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ने की उम्मीद है। यानी कि 2024, 2029 और शायद 2034 के लोकसभा चुनाव के वक्त भी 543 सीटें ही हों।
  • जबकि राज्यों की विधानसभा के लिए जुलाई 2002 को परिसीमन आयोग का गठन किया गया। दिसंबर 2007 में परिसीमन आयोग ने अपनी सिफारिशें केंद्र सरकार को सौंप दीं। फरवरी 2008 में परिसीमन आयोग की सिफारिशें मंजूर की गईं और फिर कई राज्यों में परिसीमन हुआ।

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Parliament Building India Vs Pakistan Bangladesh; Number Of Seats In Lok Sabha Has Not Increased Since 1971

हमारे देश में 25 लाख से ज्यादा की आबादी पर एक लोकसभा सांसद है। ये दुनिया में सबसे ज्यादा है। संविधान अधिकतम दस लाख की आबादी पर एक सांसद की बात कहता है। साथ ही कहता है कि सांसदों की संख्या 550 से ज्यादा नहीं हो सकती। इसी आबादी के हिसाब से राज्यों में सीटों की संख्या बढ़ाने या घटाने की बात भी हमारे संविधान में कही गई है। इसके हिसाब से 1971 तक देश और अलग-अलग राज्यों में सीटों की संख्या भी घटी-बढ़ी। लेकिन, पिछले 50 साल से इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है। इसका नतीजा ये हुआ कि आज यूपी में 30 लाख लोगों पर एक सांसद है तो तमिलनाडु में करीब 20 लाख लोगों पर। ऊपर जो बातें हमने की उससे दो तरह के सवाल उठते हैं। पहला मौजूदा आबादी के हिसाब से राज्यों में सीटों की संख्या में बदलाव किया जाए तो कहां कितने सांसद होंगे और कितने लोगों पर एक सांसद होगा? दूसरा 10 लाख की आबादी पर एक सांसद हो तो देश में कितने सांसद होंगे और किस राज्य में कितने सांसद होंगे? आइए, दोनों बातों को बारी-बारी से समझते हैं… देश की मौजूदा आबादी के हिसाब से अगर राज्यों में सीटों को बांटा जाए तो यूपी में सीटों की संख्या बढ़कर 94 हो जाएगी। बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे उत्तरी राज्यों में भी सीटें बढ़ेंगी। वहीं, तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिण के राज्यों में सीटों की संख्या घटेगी। इस स्थिति में 25.25 लाख आबादी पर एक सांसद होगा। हालांकि, इसमें छोटे राज्य शामिल नहीं होगें। संविधान में छोटे राज्यों के लिए कम से कम एक सीट की व्यवस्था दी गई है। टेबल से डिटेल समझें… अगर देश में 550 सीटों की शर्त को खत्म कर दें और हर 10 लाख की आबादी पर एक सांसद वाले नियम के हिसाब से सीटें बांटी जाएं तो अकेले यूपी में सीटों की संख्या 238 हो जाएगी। इस स्थिति में देश में कुल 1375 सीटें होगीं। यहां, एक बात और बता दें कि जिन राज्यों में 6 लाख से कम की आबादी है वहां 10 लाख पर एक सीट वाला नियम लागू नहीं होगा। ऐसे राज्यों में एक सांसद तो रहेगा ही रहेगा। ये हम नहीं संविधान कहता है। पर अब भी तीन सवाल हैं: सीटें बढ़ाने पर रोक क्यों लगी? और क्या सीटें बढ़ सकती हैं? सीटें बढ़ने का असर क्या होगा? 1. सीटें बढ़ाने पर रोक क्यों लगी? संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप बताते हैं, संविधान में मूल प्रावधान यही है कि जनसंख्या के आधार पर सीटें तय होंगी। यानी जहां आबादी ज्यादा, वहां सीटें भी ज्यादा। 1970 के दशक में सरकार ने फैमिली प्लानिंग पर भी जोर दिया। इसका नतीजा ये हुआ कि दक्षिण के राज्यों ने तो इस पर काम किया, लेकिन उत्तर भारत के राज्यों में इस पर ज्यादा काम नहीं हुआ। नतीजतन दक्षिण के राज्यों में आबादी कम और उत्तरी राज्यों में आबादी बढ़ने लगी। अब चिंता ये हुई कि जिन्होंने फैमिली प्लानिंग कर आबादी काबू में की, उनके यहां सीटें कम हो जाएंगी। यानी संसद में उन राज्यों का प्रतिनिधित्व भी कम हो जाएगा। और जिन राज्यों में आबादी बढ़ी, वहां सीटें बढ़ेंगी और संसद में उनका प्रतिनिधित्व भी बढ़ेगा। इस पर विवाद हुआ और 1977 में सरकार ने संविधान में संशोधन कर तय कर दिया कि 2001 तक 1971 की जनगणना के आधार पर ही संसद में सीटें होंगी। लेकिन 2002 में अटल सरकार ने इसे बढ़ाकर 2026 तक कर दिया। 2. क्या सीटें बढ़ सकती हैं? संविधान के आर्टिकल-81 के मुताबिक लोकसभा में सीटों की संख्या 550 से ज्यादा नहीं हो सकती। ऐसे में क्या सीटें बढ़ सकती हैं? इस बारे में सुभाष कश्यप का कहना है कि संविधान में यही है कि आबादी के हिसाब से सीटों की संख्या तय होगी। क्योंकि अभी 2026 तक सीटें 1971 की जनगणना के आधार पर ही रहेंगी, इसलिए ये प्रावधान है। लेकिन जब 2026 के बाद अगली जनगणना होगी, तो सीटें आबादी के हिसाब से बढ़ सकती हैं। अगर सरकार इसकी तय सीमा 2026 से और आगे बढ़ाती है, तो फिर तब तक 550 सीटें ही रहेंगीं। 3. सीटें बढ़ने का क्या असर होगा? जो पहले हुआ था, वही होगा। मतलब जिन राज्यों में आबादी कम होगी, वहां सीटों की संख्या भी कम होगी, लेकिन जिन राज्यों में आबादी ज्यादा होगी, वहां सीटें भी ज्यादा होंगी। इसको ऐसे समझ सकते हैं। जैसे अभी तमिलनाडु की आबादी 7.78 करोड़ है और वहां लोकसभा की 39 सीटें हैं। जबकि मध्य प्रदेश की आबादी 8.53 करोड़ से ज्यादा है, लेकिन यहां 29 सीटें ही हैं। तो जब आबादी के हिसाब से सीटों का बंटवारा होगा, तो मध्य प्रदेश, राजस्थान समेत उत्तर भारत के कई राज्यों में सीटें दोगुनी-तिगुनी तक बढ़ जाएगी। जबकि, तमिलनाडु, केरल समेत दक्षिणी राज्यों में सीटें बढ़ेंगी तो, लेकिन ज्यादा नहीं। इसी विवाद की वजह से पहले भी आबादी के हिसाब से सीटें बढ़ाने के प्रावधान पर रोक लगा दी थी। 1971 की जनगणना के आधार पर ही है लोकसभा सीटों की संख्या किसी राज्य में लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या कितनी होगी, इसका काम परिसीमन आयोग करता है। 1952 में परिसीमन आयोग का गठन किया गया था। संविधान के अनुच्छेद 82 में आयोग का काम भी तय किया गया है। इसके मुताबिक 10 साल में जब पहली बार जनगणना होगी, तो उसके बाद परिसीमन किया जाएगा।1976 में आपातकाल के दौरान संविधान में 42वां संशोधन किया गया। इस संशोधन के तहत 1971 की जनगणना के आधार पर ही 2001 तक विधानसभाओं और लोकसभा की सीटों की संख्या को स्थिर कर दिया गया।2001 में संविधान में 84वां संशोधन किया गया। इसके तहत 2026 के बाद जब पहली जनगणना होगी और उसके आंकड़े प्रकाशित हो जाएंगे, तो ही लोकसभा का परिसीमन किया जाएगा। यानी 2026 के बाद जनगणना होगी 2031 में। उसके बाद ही लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ने की उम्मीद है। यानी कि 2024, 2029 और शायद 2034 के लोकसभा चुनाव के वक्त भी 543 सीटें ही हों।जबकि राज्यों की विधानसभा के लिए जुलाई 2002 को परिसीमन आयोग का गठन किया गया। दिसंबर 2007 में परिसीमन आयोग ने अपनी सिफारिशें केंद्र सरकार को सौंप दीं। फरवरी 2008 में परिसीमन आयोग की सिफारिशें मंजूर की गईं और फिर कई राज्यों में परिसीमन हुआ। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें

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