लॉकडाउन के बीच सरकारी लापरवाही से कोरोना ऐसे पहुंचा गांव-गांवDainik Bhaskar


सुबह के 10 बज रहे थे। दिन था 5 मई 2020। 160 साल पुराने सूरत के रेलवे स्टेशन पर जबरदस्त भीड़ थी। एक प्लेटफॉर्म से दूसरे पर जाने के लिए स्टेशन के फुटओवर पर लोगों का हुजूम लगा हुआ था। कौन नहीं था उस भीड़ में? हैंडलूम चलाने वालों से लेकर, डायमंड पॉलिश करने वालों, मैकेनिक, ट्रक ड्राइवर और खाना बनाने वालों तक सब। इस भीड़ में कुछ हजार लोग ही नहीं जा रहे थे, बल्कि इस भीड़ में सूरत की इकोनॉमी की बैकबोन कहे जाने वाले मेहनतकश मजदूर शहर छोड़कर जा रहे थे।

टेक्सटाइल वर्कर रबिन्द्र बेहेरा और प्रफुल्ल बेहेरा इसी भीड़ का हिस्सा थे। ये दोनों भाई थे, जो करीब 2 दशक पहले रोजी-रोटी की तलाश में सूरत आये थे। रबिन्द्र हजारों किलोमीटर के सफर के लिए ट्रेन की होड़ में प्लेटफॉर्म पर आगे-आगे चल रहे थे और उनके भाई प्रफुल्ल पीछे-पीछे। रबिन्द्र ने रोटियों से भरा एक बैग टांग रखा था, जबकि प्रफुल्ल पेंसिल, खिलौने, पत्नी के लिए लिपस्टिक और बेटियों के लिए 13 कपड़ों से भरा हुआ प्लास्टिक का सूटकेस घसीट रहे थे।

कोरोना ट्रेन साबित हुई श्रमिक स्पेशल

कोरोना के मामलों में अमेरिका के बाद भारत दूसरे नंबर पर है। अब यह क्लियर हो चुका है कि बगैर प्लानिंग के लिए गए लॉकडाउन के निर्णय से बेरोजगार और भूखे प्रवासी पैनिक होकर भागने लगे। सिर्फ रबिन्द्र और प्रफुल्ल ही नहीं, बल्कि करोड़ों प्रवासी मजदूर ऐसे थे, जो बेरोजगार हो चुके थे और उनके पास खाने को रोटी नहीं थी। इस कमी को छुपाने के लिए सरकार ने प्रवासियों के सफर को आसान बनाने के नाम पर जो “श्रमिक स्पेशल” ट्रेन चलाई, वह कोरोना ट्रेन साबित हुई। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इन ट्रेनों के चलते कोरोनावायरस देश के कोने-कोने तक पहुंच गया।

श्रमिक स्पेशल ट्रेन में सफर करने वाले हर प्रवासी को कोरोना टेस्ट से गुजरना था, लेकिन सच तो यह है कि इससे सफर कर अपने घर को पहुंचे तमाम मजदूरों में से कुछ की ही जांच हुई थी। सफर के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग का नामो-निशान नहीं था। इन ट्रेनों से सफर करके मजदूर देश के उन ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच गए, जहां कोरोना के मामले या तो नहीं थे या फिर बहुत कम थे।

बंगाल की खाड़ी के नजदीक स्थित ओडिशा का गंजाम डिस्ट्रिक्ट उनमें से एक है। यहीं से थे बेहेरा भाई, जो सूरत से बैग और सूटकेस लेकर निकल रहे थे। इस जिले में सूरत से और भी प्रवासी वापस आए थे। प्रवासियों के आने तक इस जिले में कोरोना का एक भी मामला सामने नहीं आया था, लेकिन प्रवासियों के लौटने के बाद यह उन ग्रामीण जिलों में से एक हो गया, जहां कोरोना ने सबसे ज्यादा पैर फैलाया।

ओडिशा के गंजाम जिले में खेतों में काम करते किसान।
गंजाम में कोरोना की स्क्रीनिंग करते हेल्थ वर्कर्स।
देश के नक्शे में गंजाम और सूरत।

विडंबना यह है कि प्रधानमंत्री मोदी के आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल ने माना कि सरकार को इस बात का अंदाजा था कि मजदूरों के लौटने से संक्रमण ग्रामीण भारत तक पहुंच जाएगा, लेकिन मजबूरी में यह निर्णय लेना पड़ा और उनकी सरकार ने स्थितियों को संभाल लिया। हालांकि, संजीव साल्यान ने बताया कि उनके स्टेटमेंट को तोड़ा-मरोड़ा गया और उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा था।

लॉकडाउन के बीच पलायन की बाढ़

24 मार्च रात 8 बजे प्रधानमंत्री मोदी अचानक टीवी पर आए और उन्होंने अगले 3 हफ्तों के लिए लॉकडाउन की घोषणा कर दी, जो कि उनके भाषण के 4 घंटे बाद यानी 25 मार्च रात 12 बजे से लागू होना था। लॉकडाउन का निर्णय प्रधानमंत्री ने अपनी ही स्टाइल में लिया था- अचानक, नाटकीय और सख्त अंदाज में। जब यह निर्णय लिया गया, तब भारत में 600 से भी कम कोरोना के मामले थे।

लॉकडाउन के पहले दिन मुंबई का ईस्टर्न एक्सप्रेस वे।

बेहेरा भाई ने रात के खाने में मसूर की दाल, चावल और आलू की सब्जी बनाई थी, खाना खाकर दोनों भाई बिस्तर पर जाने की तैयारी में थे। वे सूरत के इंडस्ट्रियल इलाके की एक खोली में रहते थे। एक छोटे से कमरे में बेहेरा भाइयों के अलावा 4 लोग और थे। प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद सभी को फोन आना शुरू हो गए। सब लोग सोचने लगे कि यह सब बहुत जल्दी खत्म हो जाएगा।

सूरत की वह बिल्डिंग, ओडिशा के बेहेरा ब्रदर्स रहते थे।

यह सबकुछ जल्दी नहीं खत्म हुआ, लॉकडाउन 21 दिन से बढ़कर करीब ढाई महीने तक चलता रहा। इस बीच, मजदूरों के घर की तरफ पैदल चल देने की तमाम खबरें आने लगीं। तब 1 मई यानी श्रमिक दिवस के दिन सरकार ने श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाई। सरकार की सारी गाइडलाइन धरी की धरी रह गई और भारत की लाइफलाइन कही जाने वाली इंडियन रेलवे में कोरोना सफर करने लगा।

लॉकडाउन के दौरान चलाई गई श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेनों में खचाखच भीड़ होती थी। इन ट्रेनों के जरिए मजदूर अपने घर लौटते थे।

ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना ब्लास्ट

खचाखच भरी ट्रेन में 27 घंटे के सफर के दौरान ही प्रफुल्ल को बुखार महसूस होने लगा था। दोपहर 1 बजे 6 मई को बेहेरा भाई अपने जिले यानी गंजाम पहुंचे। उनके साथ हजारों की संख्या में और भी प्रवासी गंजाम जिले के गांव-गांव में पहुंचे। इनमें से ज्यादातर लोगों की तबीयत ठीक नहीं थी।

गंजाम के मछुआरे अपनी तैयारियों में।

गंजाम के सैकड़ों स्कूलों को क्वारैंटाइन सेंटर में बदल दिया गया। बहेरा भाइयों को भी बताया गया कि वे अगले 21 दिनों तक क्वारैंटाइन हैं। प्रफुल्ल को अब सिरदर्द भी शुरू हो चुका था। अगले दिन सुबह तक प्रफुल्ल को सांस लेने में भी दिक्कत होने लगी और उन्होंने इसकी जानकारी अपनी पत्नी को दी। उन्होंने पत्नी से बोला कि मैं तुम्हें देखना चाहता हूं और एक घंटे बाद उनकी मौत हो गई। प्रफुल्ल की बेटियों को कपड़े और पत्नी को लिपस्टिक तो मिल गई, लेकिन बेटियों को पिता और पत्नी को पति नहीं मिल पाया।

गंजाम की गलियां।

क्वारैंटाइन सेंटर्स में चेकअप और डॉक्टर्स की कोई व्यवस्था नहीं थी। बस एक औपचारिकता थी। राज्यों को तैयारी का कोई मौका ही नहीं मिल पाया और भीड़ पहुंचने लगी थी। धीरे-धीरे गंजाम के पूरे जिले में संक्रमण फैलने लगा और लोग बीमार पड़ने लगे। इस बीच श्रमिक स्पेशल चलती रही और मजदूर आते रहे।

गंजाम के हेल्थ अधिकारियों ने केंद्र सरकार को चेतावनी दी कि इस तरह की पैक्ड ट्रेनों में मजदूरों को भेजना कोरोना बम में आग लगाने जैसा है, लेकिन ट्रेनों का सिलसिला नहीं थमा। उस दौरान भारत में हर दिन 70 हजार लोगों का टेस्ट हो रहा था। यह आंकड़ा श्रमिक स्पेशल में भरकर रोज भेजे जा रहे मजदूरों से भी बहुत कम था। गंजाम के पास तो क्वारैंटाइन करने की क्षमता भी नहीं बची थी।

प्रफुल्ल बेहेरा, जिन्हें श्रमिक ट्रेन में सफर के दौरान कोरोना हुआ और उनकी मौत हो गई।

गंजाम के डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल में कोरोना मरीजों की देखभाल करने वाले डॉक्टर उमाशंकर मिश्रा ने बताया, “एक बार 200 मरीजों के लिए ऑक्सीजन की कमी हो गई थी। हालांकि, 15 मिनट में ऑक्सीजन मंगवा ली गई, लेकिन मैं अपने पूरे करियर में इससे ज्यादा कभी नहीं डरा।”

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सरकार के इस गैर-जिम्मेदाराना रवैये से भारत के ग्रामीण इलाकों में कोरोना विस्फोट हुआ, जिसे रोका जाना बहुत जरूरी था। सरकार ने प्लानिंग में इन चीजों को नजरअंदाज किया। ये कहानी सिर्फ बेहेरा भाइयों तक सीमित नहीं है। ऐसे कई मामले कर्नाटक और आंध्रप्रदेश समेत पूरे देश में मिल जाएंगे।

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Coronavirus India Update; Understand How Novel Coronavirus Disease Spread In Odisha Ganjam Rural Village

सुबह के 10 बज रहे थे। दिन था 5 मई 2020। 160 साल पुराने सूरत के रेलवे स्टेशन पर जबरदस्त भीड़ थी। एक प्लेटफॉर्म से दूसरे पर जाने के लिए स्टेशन के फुटओवर पर लोगों का हुजूम लगा हुआ था। कौन नहीं था उस भीड़ में? हैंडलूम चलाने वालों से लेकर, डायमंड पॉलिश करने वालों, मैकेनिक, ट्रक ड्राइवर और खाना बनाने वालों तक सब। इस भीड़ में कुछ हजार लोग ही नहीं जा रहे थे, बल्कि इस भीड़ में सूरत की इकोनॉमी की बैकबोन कहे जाने वाले मेहनतकश मजदूर शहर छोड़कर जा रहे थे। टेक्सटाइल वर्कर रबिन्द्र बेहेरा और प्रफुल्ल बेहेरा इसी भीड़ का हिस्सा थे। ये दोनों भाई थे, जो करीब 2 दशक पहले रोजी-रोटी की तलाश में सूरत आये थे। रबिन्द्र हजारों किलोमीटर के सफर के लिए ट्रेन की होड़ में प्लेटफॉर्म पर आगे-आगे चल रहे थे और उनके भाई प्रफुल्ल पीछे-पीछे। रबिन्द्र ने रोटियों से भरा एक बैग टांग रखा था, जबकि प्रफुल्ल पेंसिल, खिलौने, पत्नी के लिए लिपस्टिक और बेटियों के लिए 13 कपड़ों से भरा हुआ प्लास्टिक का सूटकेस घसीट रहे थे। कोरोना ट्रेन साबित हुई श्रमिक स्पेशल कोरोना के मामलों में अमेरिका के बाद भारत दूसरे नंबर पर है। अब यह क्लियर हो चुका है कि बगैर प्लानिंग के लिए गए लॉकडाउन के निर्णय से बेरोजगार और भूखे प्रवासी पैनिक होकर भागने लगे। सिर्फ रबिन्द्र और प्रफुल्ल ही नहीं, बल्कि करोड़ों प्रवासी मजदूर ऐसे थे, जो बेरोजगार हो चुके थे और उनके पास खाने को रोटी नहीं थी। इस कमी को छुपाने के लिए सरकार ने प्रवासियों के सफर को आसान बनाने के नाम पर जो “श्रमिक स्पेशल” ट्रेन चलाई, वह कोरोना ट्रेन साबित हुई। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इन ट्रेनों के चलते कोरोनावायरस देश के कोने-कोने तक पहुंच गया। श्रमिक स्पेशल ट्रेन में सफर करने वाले हर प्रवासी को कोरोना टेस्ट से गुजरना था, लेकिन सच तो यह है कि इससे सफर कर अपने घर को पहुंचे तमाम मजदूरों में से कुछ की ही जांच हुई थी। सफर के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग का नामो-निशान नहीं था। इन ट्रेनों से सफर करके मजदूर देश के उन ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच गए, जहां कोरोना के मामले या तो नहीं थे या फिर बहुत कम थे। बंगाल की खाड़ी के नजदीक स्थित ओडिशा का गंजाम डिस्ट्रिक्ट उनमें से एक है। यहीं से थे बेहेरा भाई, जो सूरत से बैग और सूटकेस लेकर निकल रहे थे। इस जिले में सूरत से और भी प्रवासी वापस आए थे। प्रवासियों के आने तक इस जिले में कोरोना का एक भी मामला सामने नहीं आया था, लेकिन प्रवासियों के लौटने के बाद यह उन ग्रामीण जिलों में से एक हो गया, जहां कोरोना ने सबसे ज्यादा पैर फैलाया। ओडिशा के गंजाम जिले में खेतों में काम करते किसान।गंजाम में कोरोना की स्क्रीनिंग करते हेल्थ वर्कर्स।देश के नक्शे में गंजाम और सूरत।विडंबना यह है कि प्रधानमंत्री मोदी के आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल ने माना कि सरकार को इस बात का अंदाजा था कि मजदूरों के लौटने से संक्रमण ग्रामीण भारत तक पहुंच जाएगा, लेकिन मजबूरी में यह निर्णय लेना पड़ा और उनकी सरकार ने स्थितियों को संभाल लिया। हालांकि, संजीव साल्यान ने बताया कि उनके स्टेटमेंट को तोड़ा-मरोड़ा गया और उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा था। Yes, your journalist did speak to me but the article does not reflect the conversation and uses an arbitrary two word “quote”. Would you like to hear the conversation? I have the full audio recording. https://t.co/yWjIeSgYT2 — Sanjeev Sanyal (@sanjeevsanyal) December 16, 2020लॉकडाउन के बीच पलायन की बाढ़ 24 मार्च रात 8 बजे प्रधानमंत्री मोदी अचानक टीवी पर आए और उन्होंने अगले 3 हफ्तों के लिए लॉकडाउन की घोषणा कर दी, जो कि उनके भाषण के 4 घंटे बाद यानी 25 मार्च रात 12 बजे से लागू होना था। लॉकडाउन का निर्णय प्रधानमंत्री ने अपनी ही स्टाइल में लिया था- अचानक, नाटकीय और सख्त अंदाज में। जब यह निर्णय लिया गया, तब भारत में 600 से भी कम कोरोना के मामले थे। लॉकडाउन के पहले दिन मुंबई का ईस्टर्न एक्सप्रेस वे।बेहेरा भाई ने रात के खाने में मसूर की दाल, चावल और आलू की सब्जी बनाई थी, खाना खाकर दोनों भाई बिस्तर पर जाने की तैयारी में थे। वे सूरत के इंडस्ट्रियल इलाके की एक खोली में रहते थे। एक छोटे से कमरे में बेहेरा भाइयों के अलावा 4 लोग और थे। प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद सभी को फोन आना शुरू हो गए। सब लोग सोचने लगे कि यह सब बहुत जल्दी खत्म हो जाएगा। सूरत की वह बिल्डिंग, ओडिशा के बेहेरा ब्रदर्स रहते थे।यह सबकुछ जल्दी नहीं खत्म हुआ, लॉकडाउन 21 दिन से बढ़कर करीब ढाई महीने तक चलता रहा। इस बीच, मजदूरों के घर की तरफ पैदल चल देने की तमाम खबरें आने लगीं। तब 1 मई यानी श्रमिक दिवस के दिन सरकार ने श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाई। सरकार की सारी गाइडलाइन धरी की धरी रह गई और भारत की लाइफलाइन कही जाने वाली इंडियन रेलवे में कोरोना सफर करने लगा। लॉकडाउन के दौरान चलाई गई श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेनों में खचाखच भीड़ होती थी। इन ट्रेनों के जरिए मजदूर अपने घर लौटते थे।ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना ब्लास्ट खचाखच भरी ट्रेन में 27 घंटे के सफर के दौरान ही प्रफुल्ल को बुखार महसूस होने लगा था। दोपहर 1 बजे 6 मई को बेहेरा भाई अपने जिले यानी गंजाम पहुंचे। उनके साथ हजारों की संख्या में और भी प्रवासी गंजाम जिले के गांव-गांव में पहुंचे। इनमें से ज्यादातर लोगों की तबीयत ठीक नहीं थी। गंजाम के मछुआरे अपनी तैयारियों में।गंजाम के सैकड़ों स्कूलों को क्वारैंटाइन सेंटर में बदल दिया गया। बहेरा भाइयों को भी बताया गया कि वे अगले 21 दिनों तक क्वारैंटाइन हैं। प्रफुल्ल को अब सिरदर्द भी शुरू हो चुका था। अगले दिन सुबह तक प्रफुल्ल को सांस लेने में भी दिक्कत होने लगी और उन्होंने इसकी जानकारी अपनी पत्नी को दी। उन्होंने पत्नी से बोला कि मैं तुम्हें देखना चाहता हूं और एक घंटे बाद उनकी मौत हो गई। प्रफुल्ल की बेटियों को कपड़े और पत्नी को लिपस्टिक तो मिल गई, लेकिन बेटियों को पिता और पत्नी को पति नहीं मिल पाया। गंजाम की गलियां।क्वारैंटाइन सेंटर्स में चेकअप और डॉक्टर्स की कोई व्यवस्था नहीं थी। बस एक औपचारिकता थी। राज्यों को तैयारी का कोई मौका ही नहीं मिल पाया और भीड़ पहुंचने लगी थी। धीरे-धीरे गंजाम के पूरे जिले में संक्रमण फैलने लगा और लोग बीमार पड़ने लगे। इस बीच श्रमिक स्पेशल चलती रही और मजदूर आते रहे। गंजाम के हेल्थ अधिकारियों ने केंद्र सरकार को चेतावनी दी कि इस तरह की पैक्ड ट्रेनों में मजदूरों को भेजना कोरोना बम में आग लगाने जैसा है, लेकिन ट्रेनों का सिलसिला नहीं थमा। उस दौरान भारत में हर दिन 70 हजार लोगों का टेस्ट हो रहा था। यह आंकड़ा श्रमिक स्पेशल में भरकर रोज भेजे जा रहे मजदूरों से भी बहुत कम था। गंजाम के पास तो क्वारैंटाइन करने की क्षमता भी नहीं बची थी। प्रफुल्ल बेहेरा, जिन्हें श्रमिक ट्रेन में सफर के दौरान कोरोना हुआ और उनकी मौत हो गई।गंजाम के डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल में कोरोना मरीजों की देखभाल करने वाले डॉक्टर उमाशंकर मिश्रा ने बताया, “एक बार 200 मरीजों के लिए ऑक्सीजन की कमी हो गई थी। हालांकि, 15 मिनट में ऑक्सीजन मंगवा ली गई, लेकिन मैं अपने पूरे करियर में इससे ज्यादा कभी नहीं डरा।” एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सरकार के इस गैर-जिम्मेदाराना रवैये से भारत के ग्रामीण इलाकों में कोरोना विस्फोट हुआ, जिसे रोका जाना बहुत जरूरी था। सरकार ने प्लानिंग में इन चीजों को नजरअंदाज किया। ये कहानी सिर्फ बेहेरा भाइयों तक सीमित नहीं है। ऐसे कई मामले कर्नाटक और आंध्रप्रदेश समेत पूरे देश में मिल जाएंगे। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें

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