मछलियों के जाल में उलझी थी ब्रेग्जिट डील; जानिए कैसे सुलझाया EU और ब्रिटेन ने यह मसला?Dainik Bhaskar


ब्रिटेन की यूरोपियन यूनियन (EU) से अलग होने की प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच गई है। ब्रेग्जिट के बाद दोनों पक्षों की ओर से डील फाइनल करने की विंडो 31 दिसंबर को खत्म हो रही थी। डेडलाइन खत्म होने से कुछ दिन पहले ऐतिहासिक ट्रेड डील पर सहमति बन गई। अब इस डील पर दोनों पक्षों की संसद में वोटिंग होगी। जहां से पास होने के बाद ये डील कानून का शक्ल लेगी।

आखिर इस डील की दोनों पक्षों को जरूरत क्यों पड़ी? ब्रेग्जिट क्या है? डील के नहीं होने पर दोनों पक्षों पर क्या असर पड़ने वाला था? इस डील में इतना समय क्यों लगा? डील पर दोनों पक्षों का क्या कहना है? अब आगे क्या होगा? आइये जानते हैं…

इस डील की दोनों पक्षों को जरूरत क्यों पड़ी?

  • यूरोपियन यूनियन (EU) यूरोप के 27 देशों का एक संगठन है। 31 जनवरी 2020 तक ब्रिटेन भी इसका सदस्य था। लेकिन, जून 2016 में हुए जनमत संग्रह के बाद ब्रिटेन ने EU से अलग होने का फैसला किया।

  • 31 जनवरी 2020 को EU से औपचारिक रूप से अलग होने के बाद ब्रिटेन 11 महीने के ट्रांजिशन पीरियड में था। जिसमें उसे EU के नियमों का ही पालन करना पड़ रहा था। 31 दिसंबर को ये ट्रांजिशन पीरियड की विंडो खत्म हो रही है।

  • ब्रिटेन EU से अलग होने वाला पहला देश है। ब्रिटेन के EU से अलग होने की प्रॉसेस को ही ब्रेग्जिट कहते हैं। EU से अलग होने के बाद ब्रिटेन और EU के बीच आगे का व्यापार कैसे होगा, उसके लिए ही ये डील हुई है।

डील में इतना समय क्यों लगा?

  • 1993 में EU के गठन के वक्त से ही ब्रिटेन इसका हिस्सा रहा है। EU से अलग होने के बाद ब्रिटेन और EU देश कई मुद्दों पर सहमत नहीं हो रहे थे। फेयर कॉम्पिटीशन रूल्स, भविष्य में होने वाले विवादों को सुलझाने का मैकेनिज्म तैयार करना और ब्रिटेन के समुद्र में यूरोपीय यूनियन की नावों को मछली पकड़ने का अधिकार देना इनमें शामिल है। मछली पकड़ने का मुद्दा इस डील में सबसे बड़ी रुकावट बना हुआ था।

  • ब्रिटेन के EU से अलग होने के बाद दोनों पक्षों के बीच सिक्युरिटी, एयरलाइन्स सेफ्टी, इन्फॉर्मेशन शेयरिंग जैसे मुद्दों पर दोनों पक्षों में लम्बी चर्चा हुई।

मछली पकड़ने का मुद्दा इतना बड़ा क्यों है?

  • दोनों ही पक्षों की इकोनॉमी में फिशिंग इंडस्ट्री का योगदान महज 0.02% ही है। इस लिहाज से देखें तो इंग्लिश चैनल के दोनों ओर के देशों के लिए मछली पकड़ने का मुद्दा छोटा है। लेकिन, ये मुद्दा दोनों पक्षों के लिए भावनात्मक और राजनीतिक ज्यादा था।

  • EU के लिए इंग्लिश चैनल में उसकी नावों का एक्सेस ट्रेड एग्रीमेंट के लिए महत्वपूर्ण था। वहीं, ब्रिटेन EU से अलग होने के बाद इसे अपने एकाधिकार से जोड़ रहा था।

  • ब्रिटिश सरकार फिशिंग के लिए ब्रिटेन का कोटा बढ़ाने का दबाव डाल रही थी। जबकि, EU चाहता था कि दोनों ओर से जो भी मछलियां पकड़ी जाएं, उन्हें दोनों पक्षों में बांटा जाए।

जब फिशिंग इंडस्ट्री इकोनॉमी में 0.02% की तो क्या इसके पीछे राजनीति थी?

  • 2016 में ब्रिटेन के मौजूदा पीएम बोरिस जॉनसन ब्रेग्जिट कैंपेन के सबसे चर्चित नाम बनकर उभरे थे। जॉनसन अपने कैम्पेन में अक्सर कहते थे कि ब्रिटेन जब EU से अलग होगा तो उसे उसके नेशनल वॉटर पर फिर से कंट्रोल मिल जाएगा।

  • अब जॉनसन ब्रिटेन के पीएम हैं इसलिए उनकी ओर से कोशिश थी कि नया एग्रीमेंट ऐसा हो, जिसमें उनके कैंपेन की बातें भी आएं। कहा जा रहा है की फिशिंग पर कंट्रोल के मुद्दे पर फ्रांस की ओर से भी गतिरोध था।

डील पर दोनों पक्षों का क्या कहना है?

डील होने के बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने सोशल मीडिया पर लिखा कि हमने अपनी किस्मत वापस ले ली। लोग कहते थे कि यह नामुमकिन है, लेकिन हमने इसे हासिल कर लिया है। वहीं, यूरोपियन कमीशन की प्रेसिडेंट उर्सला वोन डेर लेयन ने कहा कि आखिरकार हमें एक अच्छी डील मिल गई है। यह दोनों पक्षों के लिए सही है। इसके साथ ही ब्रिटेन की ब्रेग्जिट प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में पहुंच गई है।

अब आगे क्या?

  • सबसे पहले तो दोनों पक्षों की संसद में इस डील को मंजूरी दी जाएगी। उसके बाद ये डील कानूनी रूप ले लेगी। ब्रिटेन की विपक्षी लेबर पार्टी ने डील का समर्थन करने का ऐलान कर दिया है तो संसद में इसके पास होने में कोई खास अड़चन नहीं दिख रही है।

  • डील के कानून की शक्ल लेते ही ब्रेग्जिट के बाद का वक्त शुरू होगा। जिसमें EU और ब्रिटेन के अलग-अलग बाजार होंगे। हालांकि, ब्रिटेन और EU सीमा पार होने वाले व्यापार के लिए एक-दूसरे पर कोई टैक्स नहीं लगाएंगे। इसके लिए कोई कोटा भी फिक्स नहीं किया गया है।

  • एक हजार पन्ने की पूरी डील को अभी तक जारी नहीं किया गया है। इसके जारी होने के बाद कई और बातें सामने आएंगी। हालांकि, डील नहीं होती तो दोनों पक्ष एक-दूसरे पर भारी-भरकम टैक्स लगाते। इसे लेकर कोरोना की मार झेल रहे दोनों पक्षों के बिजनेसमैन डरे हुए थे।

2013 में शुरू हुई ब्रेग्जिट की बात, 2021 से शुरू होगा नया इतिहास

23 जनवरी 2013: उस वक्त के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने वादा किया कि अगर उनकी कंजर्वेटिव पार्टी 2015 का आम चुनाव जीतती है तो EU में रहने या उससे बाहर होने को लेकर जनमत संग्रह कराया जाएगा।

7 मई 2015: कंजर्वेटिव पार्टी ने आम चुनाव में जीत दर्ज की। कैमरन एक बार फिर प्रधानमंत्री बने।

23 जून 2016: EU से अलग होने के लिए जनमत संग्रह हुआ। 52 प्रतिशत लोगों ने EU से अलग होने के पक्ष में वोट दिया। इसके बाद कैमरन को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और थेरेसा मे प्रधानमंत्री बनीं।

29 मार्च 2017ः ब्रिटेन ने EU से अलग होने की प्रक्रिया शुरू की।

13 नवंबर 2018ः ब्रिटेन ने EU से अलग होने का ड्राफ्ट तैयार किया।

15 जनवरी 2019ः ब्रिटिश संसद ने ब्रेग्जिट डील को खारिज किया।

29 जनवरी 2019ः ब्रिटेन के सांसदों ने नई डील तैयार करने के लिए वोट किया।

29 मार्च 2019ः ब्रिटेन EU से औपचारिक रूप से अलग हुआ, लेकिन फाइनल डील के लिए ट्रांजिशन पीरियड शुरू हुआ।

24 जुलाई 2019: ब्रेग्जिट डील में सफल नहीं होने के कारण थेरेसा मे ने इस्तीफा दिया। इसके बाद ब्रेग्जिट के समर्थक बोरिस जॉनसन प्रधानमंत्री बने।

2 अक्टूबर 2019: बोरिस जॉनसन ने EU में ब्रेग्जिट प्लान पेश किया।

28 अक्टूबर 2019: EU ने ब्रेग्जिट एग्रीमेंट के लिए ‘फ्लैक्सेशन’ डेट 31 जनवरी की। यानी, तब तक ब्रिटेन EU का हिस्सा रहेगा।

12 दिसंबर 2019: गेट ब्रेग्जिट डन के नारे के साथ बोरिस जॉनसन फिर से सत्ता में लौटे।

31 जनवरी 2020: ब्रिटेन आखिरकार EU से अलग हुआ। 31 दिसंबर तक का ट्रांजिशन पीरियड फाइनल डील के लिए शुरू हुआ। जिसमें ब्रिटेन पर EU के फ्री ट्रेड वाले नियम चलते रहेंगे। हालांकि, वो EU की डिसीजन मेकिंग बॉडी का हिस्सा नहीं रहा।

24 दिसंबर 2020: आखिरकार ब्रिटेन और EU के बीच ब्रेग्जिट डील फाइनल हुई।

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Explainer: all you need to know about UK leaving the EU Brexit deal

ब्रिटेन की यूरोपियन यूनियन (EU) से अलग होने की प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच गई है। ब्रेग्जिट के बाद दोनों पक्षों की ओर से डील फाइनल करने की विंडो 31 दिसंबर को खत्म हो रही थी। डेडलाइन खत्म होने से कुछ दिन पहले ऐतिहासिक ट्रेड डील पर सहमति बन गई। अब इस डील पर दोनों पक्षों की संसद में वोटिंग होगी। जहां से पास होने के बाद ये डील कानून का शक्ल लेगी। आखिर इस डील की दोनों पक्षों को जरूरत क्यों पड़ी? ब्रेग्जिट क्या है? डील के नहीं होने पर दोनों पक्षों पर क्या असर पड़ने वाला था? इस डील में इतना समय क्यों लगा? डील पर दोनों पक्षों का क्या कहना है? अब आगे क्या होगा? आइये जानते हैं… इस डील की दोनों पक्षों को जरूरत क्यों पड़ी? यूरोपियन यूनियन (EU) यूरोप के 27 देशों का एक संगठन है। 31 जनवरी 2020 तक ब्रिटेन भी इसका सदस्य था। लेकिन, जून 2016 में हुए जनमत संग्रह के बाद ब्रिटेन ने EU से अलग होने का फैसला किया। 31 जनवरी 2020 को EU से औपचारिक रूप से अलग होने के बाद ब्रिटेन 11 महीने के ट्रांजिशन पीरियड में था। जिसमें उसे EU के नियमों का ही पालन करना पड़ रहा था। 31 दिसंबर को ये ट्रांजिशन पीरियड की विंडो खत्म हो रही है। ब्रिटेन EU से अलग होने वाला पहला देश है। ब्रिटेन के EU से अलग होने की प्रॉसेस को ही ब्रेग्जिट कहते हैं। EU से अलग होने के बाद ब्रिटेन और EU के बीच आगे का व्यापार कैसे होगा, उसके लिए ही ये डील हुई है। डील में इतना समय क्यों लगा? 1993 में EU के गठन के वक्त से ही ब्रिटेन इसका हिस्सा रहा है। EU से अलग होने के बाद ब्रिटेन और EU देश कई मुद्दों पर सहमत नहीं हो रहे थे। फेयर कॉम्पिटीशन रूल्स, भविष्य में होने वाले विवादों को सुलझाने का मैकेनिज्म तैयार करना और ब्रिटेन के समुद्र में यूरोपीय यूनियन की नावों को मछली पकड़ने का अधिकार देना इनमें शामिल है। मछली पकड़ने का मुद्दा इस डील में सबसे बड़ी रुकावट बना हुआ था। ब्रिटेन के EU से अलग होने के बाद दोनों पक्षों के बीच सिक्युरिटी, एयरलाइन्स सेफ्टी, इन्फॉर्मेशन शेयरिंग जैसे मुद्दों पर दोनों पक्षों में लम्बी चर्चा हुई। मछली पकड़ने का मुद्दा इतना बड़ा क्यों है? दोनों ही पक्षों की इकोनॉमी में फिशिंग इंडस्ट्री का योगदान महज 0.02% ही है। इस लिहाज से देखें तो इंग्लिश चैनल के दोनों ओर के देशों के लिए मछली पकड़ने का मुद्दा छोटा है। लेकिन, ये मुद्दा दोनों पक्षों के लिए भावनात्मक और राजनीतिक ज्यादा था। EU के लिए इंग्लिश चैनल में उसकी नावों का एक्सेस ट्रेड एग्रीमेंट के लिए महत्वपूर्ण था। वहीं, ब्रिटेन EU से अलग होने के बाद इसे अपने एकाधिकार से जोड़ रहा था। ब्रिटिश सरकार फिशिंग के लिए ब्रिटेन का कोटा बढ़ाने का दबाव डाल रही थी। जबकि, EU चाहता था कि दोनों ओर से जो भी मछलियां पकड़ी जाएं, उन्हें दोनों पक्षों में बांटा जाए। जब फिशिंग इंडस्ट्री इकोनॉमी में 0.02% की तो क्या इसके पीछे राजनीति थी? 2016 में ब्रिटेन के मौजूदा पीएम बोरिस जॉनसन ब्रेग्जिट कैंपेन के सबसे चर्चित नाम बनकर उभरे थे। जॉनसन अपने कैम्पेन में अक्सर कहते थे कि ब्रिटेन जब EU से अलग होगा तो उसे उसके नेशनल वॉटर पर फिर से कंट्रोल मिल जाएगा। अब जॉनसन ब्रिटेन के पीएम हैं इसलिए उनकी ओर से कोशिश थी कि नया एग्रीमेंट ऐसा हो, जिसमें उनके कैंपेन की बातें भी आएं। कहा जा रहा है की फिशिंग पर कंट्रोल के मुद्दे पर फ्रांस की ओर से भी गतिरोध था। डील पर दोनों पक्षों का क्या कहना है? डील होने के बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने सोशल मीडिया पर लिखा कि हमने अपनी किस्मत वापस ले ली। लोग कहते थे कि यह नामुमकिन है, लेकिन हमने इसे हासिल कर लिया है। वहीं, यूरोपियन कमीशन की प्रेसिडेंट उर्सला वोन डेर लेयन ने कहा कि आखिरकार हमें एक अच्छी डील मिल गई है। यह दोनों पक्षों के लिए सही है। इसके साथ ही ब्रिटेन की ब्रेग्जिट प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में पहुंच गई है। अब आगे क्या? सबसे पहले तो दोनों पक्षों की संसद में इस डील को मंजूरी दी जाएगी। उसके बाद ये डील कानूनी रूप ले लेगी। ब्रिटेन की विपक्षी लेबर पार्टी ने डील का समर्थन करने का ऐलान कर दिया है तो संसद में इसके पास होने में कोई खास अड़चन नहीं दिख रही है। डील के कानून की शक्ल लेते ही ब्रेग्जिट के बाद का वक्त शुरू होगा। जिसमें EU और ब्रिटेन के अलग-अलग बाजार होंगे। हालांकि, ब्रिटेन और EU सीमा पार होने वाले व्यापार के लिए एक-दूसरे पर कोई टैक्स नहीं लगाएंगे। इसके लिए कोई कोटा भी फिक्स नहीं किया गया है। एक हजार पन्ने की पूरी डील को अभी तक जारी नहीं किया गया है। इसके जारी होने के बाद कई और बातें सामने आएंगी। हालांकि, डील नहीं होती तो दोनों पक्ष एक-दूसरे पर भारी-भरकम टैक्स लगाते। इसे लेकर कोरोना की मार झेल रहे दोनों पक्षों के बिजनेसमैन डरे हुए थे। 2013 में शुरू हुई ब्रेग्जिट की बात, 2021 से शुरू होगा नया इतिहास 23 जनवरी 2013: उस वक्त के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने वादा किया कि अगर उनकी कंजर्वेटिव पार्टी 2015 का आम चुनाव जीतती है तो EU में रहने या उससे बाहर होने को लेकर जनमत संग्रह कराया जाएगा। 7 मई 2015: कंजर्वेटिव पार्टी ने आम चुनाव में जीत दर्ज की। कैमरन एक बार फिर प्रधानमंत्री बने। 23 जून 2016: EU से अलग होने के लिए जनमत संग्रह हुआ। 52 प्रतिशत लोगों ने EU से अलग होने के पक्ष में वोट दिया। इसके बाद कैमरन को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और थेरेसा मे प्रधानमंत्री बनीं। 29 मार्च 2017ः ब्रिटेन ने EU से अलग होने की प्रक्रिया शुरू की। 13 नवंबर 2018ः ब्रिटेन ने EU से अलग होने का ड्राफ्ट तैयार किया। 15 जनवरी 2019ः ब्रिटिश संसद ने ब्रेग्जिट डील को खारिज किया। 29 जनवरी 2019ः ब्रिटेन के सांसदों ने नई डील तैयार करने के लिए वोट किया। 29 मार्च 2019ः ब्रिटेन EU से औपचारिक रूप से अलग हुआ, लेकिन फाइनल डील के लिए ट्रांजिशन पीरियड शुरू हुआ। 24 जुलाई 2019: ब्रेग्जिट डील में सफल नहीं होने के कारण थेरेसा मे ने इस्तीफा दिया। इसके बाद ब्रेग्जिट के समर्थक बोरिस जॉनसन प्रधानमंत्री बने। 2 अक्टूबर 2019: बोरिस जॉनसन ने EU में ब्रेग्जिट प्लान पेश किया। 28 अक्टूबर 2019: EU ने ब्रेग्जिट एग्रीमेंट के लिए ‘फ्लैक्सेशन’ डेट 31 जनवरी की। यानी, तब तक ब्रिटेन EU का हिस्सा रहेगा। 12 दिसंबर 2019: गेट ब्रेग्जिट डन के नारे के साथ बोरिस जॉनसन फिर से सत्ता में लौटे। 31 जनवरी 2020: ब्रिटेन आखिरकार EU से अलग हुआ। 31 दिसंबर तक का ट्रांजिशन पीरियड फाइनल डील के लिए शुरू हुआ। जिसमें ब्रिटेन पर EU के फ्री ट्रेड वाले नियम चलते रहेंगे। हालांकि, वो EU की डिसीजन मेकिंग बॉडी का हिस्सा नहीं रहा। 24 दिसंबर 2020: आखिरकार ब्रिटेन और EU के बीच ब्रेग्जिट डील फाइनल हुई। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें

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