कोरोना महामारी ने करीब 160 करोड़ छात्रों की पढ़ाई पर असर डालाDainik Bhaskar


कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया में जीवन को इतने बड़े पैमाने पर बाधित किया, जैसा 2020 से पहले कभी नहीं हुआ था। इसका विपरीत प्रभाव यूं तो हर सेक्टर पर पड़ा है, मगर कुछ सेक्टर्स ने यह साबित किया है कि पारंपरिक तरीकों के बाधित होने पर वहां नए प्रयोग करने और उन्हें काफी बड़े पैमाने पर लागू करने के अवसर और क्षमता है। शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ ऐसा ही हुआ है।

आंकड़ों पर गौर करें तो कोरोना महामारी ने करीब 160 करोड़ छात्रों की पढ़ाई पर असर डाला। उन्हें बिल्कुल नई व्यवस्था आजमाने को मजबूर किया। इस नई हाइब्रिड व्यवस्था में फोकस टीचर से आमने-सामने के संवाद के बजाय इनोवेशन पर शिफ्ट हो गया। हालांकि इस वैश्विक संकट ने यह स्पष्ट कर दिया कि हमारे सीखने और सिखाने के तरीकों को प्रभावित करने वाला कारक, तकनीक है।
कई लोगों का मानना है कि महामारी का दौर बीतने के बाद ऑनलाइन एजुकेशन भी बीते जमाने की बात हो जाएगी और दुनिया फिर क्लास रूम्स में लौटेगी। हालांकि, ऑनलाइन माध्यम ने शिक्षा से जुड़ी दो पुरानी समस्याओं को हल कर साबित किया है कि यह न सिर्फ लंबी चलने वाली है, बल्कि भविष्य के लिए तैयार है।

ये दो समस्याएं थीं, एक्सेस, यानी शिक्षा तक पहुंच और अफोर्डेबिलिटी यानी शिक्षा का खर्च। पारंपरिक व्यवस्था में किसी को अच्छी शिक्षा मिलना काफी हद तक उसकी भौगोलिक-सामाजिक स्थिति पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए अच्छी शिक्षा के लिए अच्छे शहर में रहना व परिवार की अच्छी आर्थिक स्थिति जरूरी है, अच्छे शिक्षकों और इनसे जुड़े समुदायों तक पहुंच जरूरी है।

कोविड-19 महामारी ने इस पूरी व्यवस्था को ध्वस्त कर हर वर्ग, हर शहर-गांव के सभी छात्रों को एक श्रेणी में ला खड़ा किया है। आज, तकनीक की वजह से हर छात्र की पहुंच श्रेष्ठ शिक्षा और श्रेष्ठ शिक्षकों तक हो गई है, भले ही वह कहीं भी रहता हो। वह भी काफी कम खर्च पर। यह सच्चाई, महामारी के दौर के बाद भी बनी रहेगी। इसका अर्थ है कि स्कूलों के लिए तकनीक को स्वीकार करना और उसे अपने छात्रों के लिए एक सकारात्मक ऊर्जा के रूप में अपनी व्यवस्था में समाहित करना जरूरी हो गया है।
महामारी ने हमें दिखा दिया कि तकनीक में निवेश करना बहुत जरूरी है ताकि एक ऐसा माहौल बनाया जा सके जिसमें बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले। यह व्यवस्था भौगोलिक दूरियों और डिजिटल डिवाइड को भी पाटने में सक्षम हो। शिक्षा अब सिर्फ मूलभूत अधिकार नहीं रह गया, अब यह एक जरिया है, जिससे आप न सिर्फ समान अवसर पा सकते हैं बल्कि अपना जीवन स्तर सुधार सकते हैं।

हालांकि, ऑनलाइन एजुकेशन तभी प्रभावशाली हो सकती है जब उसके लिए ऐसी ठोस व्यवस्था बने जिसमें एक पारंपरिक कक्षा की नकल करने के बजाय हर छात्र पर अलग ध्यान दिया जाए। इसके लिए कई तकनीकी माध्यमों और शिक्षण के तरीकों का समन्वय किया जा सकता है जिससे हर छात्र से संवाद हो।

शिक्षकों को भी ऐसे माहौल में पढ़ाने की ट्रेनिंग देना जरूरी है जिसमें आमने-सामने का संवाद घट जाए मगर पढ़ाने का दायरा ज्यादा बड़ा हो। जहां तक क्षमता, पहुंच और गुणवत्ता की बात है, ऑनलाइन एजुकेशन अपनी सफलता पहले ही साबित कर चुकी है। शिक्षा में यह बदलाव लाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका तकनीक की है, इसलिए शिक्षा प्रदाता की यह जिम्मेदारी है कि यह भूमिका 2021 और उसके भी आगे बनी रहे।

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गौरव मुंजाल, सह-संस्थापक और सीईओ, अनएकेडमी

कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया में जीवन को इतने बड़े पैमाने पर बाधित किया, जैसा 2020 से पहले कभी नहीं हुआ था। इसका विपरीत प्रभाव यूं तो हर सेक्टर पर पड़ा है, मगर कुछ सेक्टर्स ने यह साबित किया है कि पारंपरिक तरीकों के बाधित होने पर वहां नए प्रयोग करने और उन्हें काफी बड़े पैमाने पर लागू करने के अवसर और क्षमता है। शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। आंकड़ों पर गौर करें तो कोरोना महामारी ने करीब 160 करोड़ छात्रों की पढ़ाई पर असर डाला। उन्हें बिल्कुल नई व्यवस्था आजमाने को मजबूर किया। इस नई हाइब्रिड व्यवस्था में फोकस टीचर से आमने-सामने के संवाद के बजाय इनोवेशन पर शिफ्ट हो गया। हालांकि इस वैश्विक संकट ने यह स्पष्ट कर दिया कि हमारे सीखने और सिखाने के तरीकों को प्रभावित करने वाला कारक, तकनीक है। कई लोगों का मानना है कि महामारी का दौर बीतने के बाद ऑनलाइन एजुकेशन भी बीते जमाने की बात हो जाएगी और दुनिया फिर क्लास रूम्स में लौटेगी। हालांकि, ऑनलाइन माध्यम ने शिक्षा से जुड़ी दो पुरानी समस्याओं को हल कर साबित किया है कि यह न सिर्फ लंबी चलने वाली है, बल्कि भविष्य के लिए तैयार है। ये दो समस्याएं थीं, एक्सेस, यानी शिक्षा तक पहुंच और अफोर्डेबिलिटी यानी शिक्षा का खर्च। पारंपरिक व्यवस्था में किसी को अच्छी शिक्षा मिलना काफी हद तक उसकी भौगोलिक-सामाजिक स्थिति पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए अच्छी शिक्षा के लिए अच्छे शहर में रहना व परिवार की अच्छी आर्थिक स्थिति जरूरी है, अच्छे शिक्षकों और इनसे जुड़े समुदायों तक पहुंच जरूरी है। कोविड-19 महामारी ने इस पूरी व्यवस्था को ध्वस्त कर हर वर्ग, हर शहर-गांव के सभी छात्रों को एक श्रेणी में ला खड़ा किया है। आज, तकनीक की वजह से हर छात्र की पहुंच श्रेष्ठ शिक्षा और श्रेष्ठ शिक्षकों तक हो गई है, भले ही वह कहीं भी रहता हो। वह भी काफी कम खर्च पर। यह सच्चाई, महामारी के दौर के बाद भी बनी रहेगी। इसका अर्थ है कि स्कूलों के लिए तकनीक को स्वीकार करना और उसे अपने छात्रों के लिए एक सकारात्मक ऊर्जा के रूप में अपनी व्यवस्था में समाहित करना जरूरी हो गया है। महामारी ने हमें दिखा दिया कि तकनीक में निवेश करना बहुत जरूरी है ताकि एक ऐसा माहौल बनाया जा सके जिसमें बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले। यह व्यवस्था भौगोलिक दूरियों और डिजिटल डिवाइड को भी पाटने में सक्षम हो। शिक्षा अब सिर्फ मूलभूत अधिकार नहीं रह गया, अब यह एक जरिया है, जिससे आप न सिर्फ समान अवसर पा सकते हैं बल्कि अपना जीवन स्तर सुधार सकते हैं। हालांकि, ऑनलाइन एजुकेशन तभी प्रभावशाली हो सकती है जब उसके लिए ऐसी ठोस व्यवस्था बने जिसमें एक पारंपरिक कक्षा की नकल करने के बजाय हर छात्र पर अलग ध्यान दिया जाए। इसके लिए कई तकनीकी माध्यमों और शिक्षण के तरीकों का समन्वय किया जा सकता है जिससे हर छात्र से संवाद हो। शिक्षकों को भी ऐसे माहौल में पढ़ाने की ट्रेनिंग देना जरूरी है जिसमें आमने-सामने का संवाद घट जाए मगर पढ़ाने का दायरा ज्यादा बड़ा हो। जहां तक क्षमता, पहुंच और गुणवत्ता की बात है, ऑनलाइन एजुकेशन अपनी सफलता पहले ही साबित कर चुकी है। शिक्षा में यह बदलाव लाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका तकनीक की है, इसलिए शिक्षा प्रदाता की यह जिम्मेदारी है कि यह भूमिका 2021 और उसके भी आगे बनी रहे। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें

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